16/08/2013

भला ग़मों से कहाँ हार जाने वाले थे 
हम आंसुओं की तरह मुस्कुराने वाले थे 

हमीं ने कर दिया एलान-ए-गुमराही वरना 
हमारे पीछे बहुत लोग आने वाले थे 

इन्हें तो ख़ाक में मिलना ही था, कि मेरे थे 
ये अश्क कौन से ऊंचे घराने वाले थे 

उन्हें करीब न होने दिया कभी मैंने 
जो दोस्ती में हदें भूल जाने वाले थे

मैं जिनको जान के पहचान भी नहीं सकता
कुछ ऐसे लोग, मेरा घर जलाने वाले थे

हमारा अलमिया ये था, की हमसफ़र भी हमें
वही मिले, जो बहुत याद आने वाले थे
[अलमिया=विडम्बना]

"वसीम" कैसी ताल्लुक की राह थी जिसमें
वही मिले जो बहुत दिल दुखाने वाले थे

--वसीम बरेलवी

No comments:

Post a Comment