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मेरा क़लम मेरे जज़्बात माँगने वाले मुझे न माँग मेरा हाथ माँगने वाले ये लोग कैसे अचानक अमीर बन बैठे ये सब थे भीक मेरे साथ माँगने वाले तमाम गाँव तेरे भोलपन पे हँसता है धुएँ के अब्र से बरसात माँगने वाले नहीं है सहल उसे काट लेना आँखों में कुछ और माँग मेरी रात माँगने वाले कभी बसंत में प्यासी जड़ों की चीख़ भी सुन लुटे शजर से हरे पात माँगने वाले तू अपने दश्त में प्यासा मरे तो बेहतर है समंदरों से इनायात माँगने वाले -  ज़फ़र गोरखपुरी Read more
क्या उम्मीद करे हम उन से जिनको वफ़ा मालूम नहीं ग़म देना मालूम है लेकिन ग़म की दवा मालूम नहीं जिन की गली में उम्र गँवा दी जीवन भर हैरान रहे पास भी आके पास न आये जान के भी अंजान रहे कौन सी आख़िर की थी हमने ऐसी ख़ता मालूम नहीं ऐ मेरे पागल अर्मानों झूठे बंधन तोड़ भी दो ऐ मेरी ज़ख़्मी उम्मीदों दिल का दामन छोड़ भी दो तुम को अभी इस नगरी में जीने की सज़ा मालूम नहीं - ज़फ़र गोरखपुरी Read more