28/11/2016

रंग बातें करें और बातों से ख़ुश्बू आए दर्द फूलों की तरह महके अगर तू आए

30/10/2015

वो ग़ज़ल पढने में लगता भी ग़ज़ल जैसा था,
सिर्फ़ ग़ज़लें नहीं, लहजा भी ग़ज़ल जैसा था !

वक़्त ने चेहरे को बख़्शी हैं ख़राशें वरना,
कुछ दिनों पहले ये चेहरा भी ग़ज़ल जैसा था !

तुमसे बिछडा तो पसन्द आ गयी बेतरतीबी,
इससे पहले मेरा कमरा भी ग़ज़ल जैसा था !

कोई मौसम भी बिछड कर हमें अच्छा ना लगा,
वैसे पानी का बरसना भी ग़ज़ल जैसा था !

नीम का पेड था, बरसात भी और झूला था,
गांव में गुज़रा ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था !

वो भी क्या दिन थे तेरे पांव की आहट सुन कर,
दिल का सीने में धडकना भी ग़ज़ल जैसा था !

इक ग़ज़ल देखती रहती थी दरीचे से मुझे,
सोचता हूं, वो ज़माना भी ग़ज़ल जैसा था !

कुछ तबीयत भी ग़ज़ल कहने पे आमादा थी,
कुछ तेरा फ़ूट के रोना भी ग़ज़ल जैसा था !

मेरा बचपन था, मेरा घर था, खिलौने थे मेरे,
सर पे मां-बाप का साया भी ग़ज़ल जैसा था !

नर्म-ओ-नाज़ुक-सा ­, बहुत शोख़-सा, शर्मीला-सा,
कुछ दिनों पहले तो "राना" भी ग़ज़ल जैसा था !

- Munawwar Rana
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाए।

परखना मत, परखने में कोई अपना नहीं रहता
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता
पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी,
आंखों को अभी ख्वाब छुपाने नहीं आते।

मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला
अगर गले नहीं मिलता, तो हाथ भी न मिला
तमाम रिश्तों को मैं घर पे छोड़ आया था,
फिर उस के बाद मुझे कोई अजनबी नहीं मिला।

रंग बातें करें और बातों से ख़ुश्बू आए दर्द फूलों की तरह महके अगर तू आए